Tuesday, August 30, 2011

काश यह दूसरी आजादी कि लड़ाई होती

अन्ना हजारे के आन्दोलन जिसको कुछ लोगों ने " दूसरी आजादी " कि लड़ाई का नाम ही नहीं दिया उसकी जीत का जश्न भी मना डाला | भारत कि आजादी कि लड़ाई सौ वर्षों से ज्यादा चली और हजारों लोगों ने अपनी जान कुर्बान की, अनगिनत लोगों ने अपनी पूरी ज़िन्दगी जेल में काट दी , न जाने कितने लोगों ने अपना घर बार कैरिएर त्याग दिया था | देश प्रेम के साथ शोषण और गरीबी से मुक्त ज़िन्दगी का सपना ही आजादी था | आजादी से उनका मतलब ज़मीन, भोजन , पानी , शिक्षा , रोज़गार, मकान , उचित मजदूरी मिलने से था, उन सब कि आँखों में यही सपना था कि आजादी आएगी तो भूख, गैर बराबरी, उत्पीडन, शोषण से मुक्ति लाएगी, सब के पास काम होगा और अपना देश खुशहाल होगा | उन्होंने सोचा था कि आजादी मिलेगी तो जातिवाद, सांप्रदायिक नफरत जैसे शब्द अर्थहीन हो जायेंगे | आजादी कि लड़ाई सफल हुई क्योंकि उसमे किसान, मजदूर, छात्र, नौजवान, माध्यम वर्गीय, बुध्जीवी और महिलाएं शामिल थे, समाज के हर तबके और हर समुदाय का उसको समर्थन हासिल था जबकि नेतृत्व बुर्जुआ पूंजीपति के हाथ में ही था जिससे आजादी से जुडी आकाँक्षाओं को पूरा नहीं किया जा सका | यह सच है कि आज आजादी के ६४ वर्ष बाद भी शहीदों का सपना अधूरा है और उसको पूरा करने के लिए बुनियादी संघर्ष कि ज़रुरत है जो हमें सम्पूर्ण आजादी दिला सके |

अन्ना के आन्दोलन भ्रष्टाचार को आधार बनाकर माध्यम वर्ग द्वारा किया गया आन्दोलन है जिसको हमारे कॉर्पोरेट- मीडिया ने और अतिरंजित करके प्रस्तुत किया कि जैसे लोकपाल बिल हो जाने से आजादी के संघर्ष कि अधूरी रह गयी अपेक्षाएं स्वतः पूर्ण हो जायेंगी समाज में भेदभाव उत्पीडन ,शोषण समाप्त हो जायेगा, गैर बराबरी मिट जाएगी, जातीय और सांप्रदायिक नफरत ख़त्म हो जाएगी, सब शिक्षित होंगे और सब के पास काम होगा, भोजन होगा और मकान होगा | बड़े खेद का विषय है कि मीडिया द्वारा अन्ना को मसीहा साबित करने के लिए जानबूझ कर भ्रष्टाचार के खिलाफ इस आन्दोलन को दूसरी आजादी की लड़ाई की संज्ञा दी गयी जिसमे न तो कोई व्यापक समझ थी और न ही व्यापक जन समर्थन| नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के प्रभाव में विकसित हुए नए माध्यम वर्ग द्वारा किये गए "कर्निवाली संघर्ष" को दूसरी आजादी बताना आजादी कि महान लड़ाई के साथ मज़ाक वह शहीदों का अपमान है| दूसरी आजादी कि लड़ाई हो और उसमे आम मजदूर, किसान, दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक न तो शामिल हों न ही उनके मुद्दे हों| देश के मूलभूत समस्याएं जिस आन्दोलन का हिस्सा न हों और उस आन्दोलन दूसरी आजादी कह देना निसंदेह एक घिनौना मज़ाक है| देश के किसी भी कोने पर अगर छात्र, नौजवान, मजदूर, महिला, किसान अपनी जाएज़ मांगो को लेकर आन्दोलन या प्रदर्शन करें तो राज्य द्वारा उसका दमन किया जाता है | लेकिन इस "दूसरी आजादी" के तथाकथित संघर्ष में सरकार द्वारा दमन जैसे कोई चीज़ देखने को नहीं मिली| और अगर आन्दोलन का विश्लेषण करें तो उससे यह एहसास होता है कि वोह विभिन्न टीवी चैंनलों पर चल रहे " रेआलिटी शो " कि तरह है, और लोग अपना अपना किरदार बखूबी निभा रहे हैं

यह सही है के आज भी शहीदों के अरमानों, आकांक्षाओं और आजादी के आदर्शों को पूरा करने के लिए दूसरी आजादी कि लड़ाई कि ज़रुरत है लेकिन वोह लड़ाई वही होगी जिसमे देश कि बुनियादी समस्याओं को केंद्र में रख उसकी जड़ के पूँजीवाद और नयी आर्थिक नीति के खिलाफ संघर्ष हो जिसमें देश कि व्यापकतम जनता को लामबंद किया जाये | यह निसंदेह एक राजनैतिक आन्दोलन होगा न कि अराजनैतिक तमाशे के साथ किया गया मीडिया प्रायोजित तथाकथित संघर्ष |

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